• कविगण अपनी रचना के साथ अपना डाक पता और संक्षिप्त परिचय भी जरूर से भेजने की कृपा करें।
  • आप हमें डाक से भी अपनी रचना भेज सकतें हैं। हमारा डाक पता निम्न है।

  • Kavi Manch C/o. Shambhu Choudhary, FD-453/2, SaltLake City, Kolkata-700106

    Email: ehindisahitya@gmail.com


क्रांति - प्रणव सक्सेना 'अमित्रघात'


उठो,उठाओ पत्थर
मारो फोड़ दो सर सावेग
उनका जिन्होंने उसे
कार मैं खिंचते दूर -देर तक देखा है
जो मुंह दबा हँसतें हैं और
असंख्य किरचों से
बिधि -दहपट -आधी उधडी
देह देखने की तीव्र इच्छा से जुटते हैं ,
जो उसकी करुण टेर
सुनकर भी अनसुना कर
दुरते - दुर्राते निकल गए
और जो
सरिश्ता पांतों में बंकाई से उसे देख कर
उत्तप्त उच्छवसन से दरेरते हाथ हैं
जो फेला समझ
प्रतिरूप उसकी उसके गुजरते ही
हेलकर दरीचों के कांच
ढांपती है तुंरत कनात से
और खटखटाते हैं जो कपट
निस्तब्ध अर्धरात्रि को
नगरवधू मान कर
जो रोक सकते थे मगर रोका नहीं जिन्होंने
परिसरण करती ही रही कदराई
रक्त बन जिन शिराओं में
जो खड़े ही रहे तावत
मृत आत्मा की बजबजाती लाश
काँधे लिए
हैबतनाक चुप्पी ओड़कर
उठो उठाओ पत्थर
मारो फोड़ दो सर सावेग
उनका .....
की तभी तिमिर भेदती आती है आवाज ठक की
बह उठा मृत रक्त मेरे ही कपाल से
और में स्तब्ध डबकोंहा सा जो बीङिया बन एकंग खड़ा था
आहत हो गिर धरा पर सुनता हूँ तुमुल संघोष
आगत क्रान्ति के पदचाप का
उस पत्थर को चूम
दम तोड़ता हूँ
अपने इस अंत पर मुग्ध हुआ जाता हूँ



http://amitraghat.blogspot.com/
E-Mail:pranyani@gmail.com
प्रणव सक्सेना 'अमित्रघात'
HIG -5 DUPLEX ARVIND VIHAR COLONY BAGHMUGALIYA
BHOPAL M.P. 462043
MO.9425681458
क्रमांक सूची में वापस जाएं


डा.महेंद्र भटनागर की पाँच कविताएँ


1. आदमी

गोद पाकर, कौन जो सोया नहीं ?
होश किसने प्यार में खोया नहीं ?
आदमी, पर है वही जो दर्द को
प्राण में रख, एक पल रोया नहीं !


क्रमांक सूची में वापस जाएं


2. कौन हो तुम


कौन हो तुम, चिर-प्रतीक्षा-रत
सजग, आधी अँधेरी रात में ?
उड़ रहे हैं घन तिमिर के
सृष्टि के इस छोर से उस छोर तक,
मूक इस वातावरण को
देखते नभ के सितारे एकटक,
कौन हो तुम, जागतीं जो इन
सितारों के घने संघात में ?
जल रहा यह दीप किसका,
ज्योति अभिनव ले कुटी के द्वार पर,
पंथ पर आलोक अपना
दूर तक बिखरा रहा विस्तार भर,
कौन है यह दीप ? जलता जो
अकेला, तीव्र गतिमय वात में ?
कर रहा है आज कोई
बार-बार प्रहार मन की बीन पर,
स्नेह काले लोचनों से
युग-कपोलों पर रहा रह-रह बिखर,
कौन-सी ऐसी व्यथा है,
रात में जगते हुए जलजात में ?


क्रमांक सूची में वापस जाएं


3. तुम

सचमुच, तुम कितनी भोली हो !
संकेत तुम्हारे नहीं समझ में आते,
मधु-भाव हृदय के ज्ञात नहीं हो पाते,
तुम तो अपने में ही डूबी
नभ-परियों की हमजोली हो !
तुम एक घड़ी भी ठहर नहीं पाती हो,
फिर भी जाने क्यों मन में बस जाती हो,
वायु बसंती बन, मंथर-गति
से जंगल-जंगल डोली हो !


क्रमांक सूची में वापस जाएं


4. दर्शन

मन, दर्शन करने से बंधन में बँध जाता है !
यह दर्शन सपनों में भी कर
देता सोये उर को चंचल,
लखकर शीशे-सी नव आभा
आँखें पड़ती हैं फिसल-फिसल,
नयनों का घूँघट गिर जाता, मन भर आता है !
यह दर्शन केवल क्षण भर का
बिखरा देता भोली शबनम,
बन जाता है त्योहार सजल
पीड़ामय सिसकी का मातम,
इसका वेग प्रखर आँधी से होड़ लगाता है !
यह दर्शन उज्वल स्मृति में ही
देता अंतर के तार हिला,
नीरस जीवन के उपवन में
देता है अनगिन फूल खिला,
इसका कंपन मीठा-मीठा गीत सुनाता है !
यह दर्शन प्रतिदिन-प्रतिक्षण का
लगता न कभी उर को भारी,
दिन में सोने, निशि में चाँदी
की सजती रहती फुलवारी,
यह नयनों का जीवन सार्थक पूर्ण बनाता है ।
यह दर्शन मूक लकीरों का
बरसा देता सावन के घन,
गहरे काले तम के पट पर
खिँच जाती बिजली की तड़पन,
इसका आना उर-घाटी में ज्योति जगाता है !


क्रमांक सूची में वापस जाएं


5. मत बनो कठोर

इन बड़री-बड़री अँखियों से
मत देखो प्रिय ! यों मेरी ओर !
इतने आकर्षण की छाया
जल-से अंतर पर मत डालो,
मैं पैरों पड़ता हूँ, अपनी
रूप-प्रभा को दूर हटालो,
अथवा युग नयनों में भर लो
फेंक रेशमी किरनों की डोर !
और न मेरे मन की धरती
पर सुख-स्नेह-सुधा बरसाओ,
यह ठीक नहीं, वश में करके
प्राणों को ऐसे तरसाओ,
छू लेने भर दो, कुसुमों से
अंकित जगमग आँचल का छोर !
इस सुषमा की बरखा में तो
पथ भूल रहा है भीगा मन,
तुम उत्तरदायी, यदि सीमा
तोड़े यह उमड़ा नद-यौवन,
आ जाओ ना कुछ और निकट
यों इतनी तो मत बनो कठोर !



डा.महेंद्र भटनागर का परिचय:

डा.महेंद्र भटनागर
एम.ए., पी-एच. डी. (हिंदी)।
जन्म-तिथि: 26 जून, 1926; जन्म-स्थान: झाँसी (उ.प्र. भारत)।
व्यवसाय / सम्प्रति: अध्यापन, मध्य-प्रदेश महाविद्यालयीन
शिक्षा / शोध-निर्देशक: हिन्दी भाषा एवं साहित्य।
कृतियाँ कविता: तारों के गीत (1949), टूटती शृंखलाएँ (1949), बदलता युग (1953), अभियान
(1954), अंतराल (1954), विहान (1956), नयी चेतना (1956), मधुरिमा (1959), जिजीविषा (1962), संतरण (1963), चयनिका (1966), बूँद नेह की : दीप हृदय का (1967) / हर सुबह सुहानी हो! (1984) / महेंद्र भटनागर के गीत (2001) / गीति-संगीति (2006), कविश्री : महेंद्रभटनागर (1970), संवर्त (1972), संकल्प (1977), जूझते हुए (1984), जीने के लिए (1990), आहत युग (1997), अनुभूत क्षण (2001), उमंग तथा अन्य कविताएँ (2001), डा. महेंद्र भटनागर की कविता (2002), मृत्यु-बोध : जीवन-बोध
(2002 ), राग-संवेदन (2005), कविताएँ : एक बेहतर दुनिया के लिए (2006), डा. महेंद्र भटनागर की कविता-यात्रा (2006), एक मुट्ठी रोशनी (2006), ज़िन्दगीनामा; आलोचना : आधुनिक साहित्य और कला (1956), दिव्या : एक अध्ययन (1956) / दिव्या : विचार और कला (1971), विजय-पर्व : एक अध्ययन (1957), समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद (1957), नाटककार हरिकृष्ण 'प्रेमी' और 'संवत्-प्रवर्तन' (1961), पुण्य-पर्व आलोक (1962), हिन्दी कथा-साहित्य : विविध आयाम (1988), नाटय-सिध्दान्त और
हिन्दी नाटक (1992); एकांकी : अजेय आलोक (1962); रेखाचित्र / लघुकथाएँ: लड़खड़ाते क़दम
(1952), विकृतियाँ (1958), विकृत रेखाएँ: धुँधले चित्र (1966); बाल व किशोर-साहित्य: हँस-हँस गाने
गाएँ हम! (1957), बच्चों के रूपक (1958) / स्वार्थी दैत्य एवं अन्य रूपक (1995), देश-देश की बातें (1967) / देश-देश की कहानी (1982), जय-यात्रा (1971), दादी की कहानियाँ (1974) विशिष्ट : डा. महेंद्र भटनागर-समग्र (कविता-खंड 1,2,3 / आलोचना-खंड 4,5 / विविध-खंड 6 : (2002) अनुवाद: कविताएँ अनेक विदेशी भाषाओं एवं अधिकांश भारतीय भाषाओं में अनूदित व पुस्तकाकार प्रकाशित।
संपादनः
सन्ध्या' (मासिक / उज्जैन / 1948-49), 'प्रतिकल्पा' (त्रौमासिक / उज्जैन / 1958 ),
कविश्री : 'अंचल' (1969), स्वातंत्रयोत्तार हिन्दी साहित्य (1969), गोदान-विमर्श (1983)
अध्ययनः
कवि महेंद्र भटनागर : सृजन और मूल्यांकन / सं. डा. दुर्गाप्रसाद झाला (1972),
कवि महेंद्र भटनागर का रचना-संसार / सं. डा. विनयमोहन शर्मा (1980),
डा. महेंद्र भटनागर की काव्य-साधना / ममता मिश्रा (1982),
प्रगतिवादी कवि महेंद्र भटनागर : अनुभूति और अभिव्यक्ति / डा. माधुरी शुक्ला (1985),
महेंद्र भटनागर और उनकी सर्जनशीलता / डा. विनीता मानेकर (1990),
सामाजिक चेतना के शिल्पी : कवि डा. महेंद्र भटनागर / सं. डा. हरिचरण शर्मा (1997),
डा. महेंद्र भटनागर के काव्य का वैचारिक एवं संवेदनात्मक धरातल / डा. रजत षड़ंगी (2003),
महेंद्र भटनागर की काव्य-संवेदना : अन्त:अनुशासनीय आकलन / डा. वीरेंद्र सिंह (2004),
डा. महेंद्र भटनागर का कवि-व्यक्तित्व / सं. डा. रवि रंजन (2005),
डा.महेंद्रभटनागर का रचना-कर्म / डा. किरणशंकर प्रसाद (2006),
डा. महेंद्रभटनागर की काव्य-सृष्टि / सं. डा. रामसजन पाण्डेय;
पुरस्कार-सम्मान : मध्य-भारत एवं मध्य-प्रदेश की कला व साहित्य-परिषदों द्वारा सन् 1952, 1958, 1960, 1985 में पुरस्कृत; मध्य-भारत हिन्दी साहित्य सभा, ग्वालियर द्वारा 'हिन्दी-दिवस 1979' पर सम्मान, 2 अक्टूबर 2004 को, 'गांधी-जयन्ती' के अवसर पर, 'ग्वालियर साहित्य अकादमी'-द्वारा 'डा. शिवमंगलसिंह'सुमन'- अलंकरण / सम्मान,मध्य-प्रदेश लेखक संघ, भोपाल द्वारा 'डा. संतोषकुमार तिवारी - समीक्षक-सम्मान' (2006) एवं अन्य अनेक सम्मान।
संपर्क : 110 बलवन्तनगर, गांधी रोड, ग्वालियर — 474 002 (मध्य-प्रदेश)
फ़ोन : 0751-4092908


क्रमांक सूची में वापस जाएं


श्री जयप्रकाश सेठिया की ग्यारह कविता

1.
नहीं है कोई भी,
किसी के साथ
फिर भी करते हैं
साथ निभाने की बात
दिन-रात
अगर कभी हुए भी साथ
करते हैं
एक दूसरे पर आघात


क्रमांक सूची में वापस जाएं


2.
जीवन की
पगडंडी पर
चलता है आदमी
कभी धीरे
कभी हँसते
कभी रोते
कभी सुख में
कभी दुःख में
कभी धैर्य से
कभी हांफते
कभी भागते
समझ नहीं आता
क्या हम सब करते हैं
यह मृत्यु के वास्ते।


क्रमांक सूची में वापस जाएं


3.
जब तक था
कर्म करने में सझम
तब तक रहा
कर्म के मर्म को
समझने में अक्षम
जब हुआ
समझ से सक्षम
हो गया
कर्म करने में अक्षम।


क्रमांक सूची में वापस जाएं


4.
असहज होकर
किये हुए
हर काम में
दुःख ही दुःख है
सहजता में
सुख ही सुख है।


5.
अकेला
हो गया हूँ
क्योंकि
भीड़ में
खो गया हूँ।


6.
मैं
का नाश
बनाता है
महान
'मैं'
के नाश से
होता है
ज्ञान
कर्ता से
जब बन जाता है
दृष्टा
तब
होता है ध्यान।


क्रमांक सूची में वापस जाएं


7.
न था
पहले पता
और
न है अब पता
कि होगा क्या
यह जानते हुए भी
निरर्थक सोचता हूँ
लिप्त कर्म का
अनर्थ
और निर्लिप्त कर्म का
अर्थ
फिर भी कर रहा हूं
कर्ता बनने की
चेष्टा व्यर्थ
यही से है
अनर्थ।



क्रमांक सूची में वापस जाएं


8.
जो रखते हैं
सब की खबर
वे होते हैं
स्वयं से बेखबर।



क्रमांक सूची में वापस जाएं


9.
बनने के लिए ज्योति
जलना तो पड़ेगा ही
बुझोगे तब
बनोगे विभूति



10.
सबसे बड़ा
धन
सधा हुआ
मन।


11.

सबसे बड़ी
विडम्बना है
कि आदमी नहीं बनना चाहता है
आदमी।


क्रमांक सूची में वापस जाएं



कवि परिचय:
'नमन' शीर्षक नामक श्री जयप्रकाश सेठिया का प्रथम काव्य संग्रह प्रकाशित । आप हिन्दी-राजस्थान साहित्य के माहन युग कवि श्रद्धेय श्री कन्हैयालाल सेठिया जी के ज्येष्ठ पुत्र हैं। आपको कवि हृदय विरासत में मिली है। आप पिचले 45 वर्षों से सतत लिखते रहें हैं।
अपरोक्त सभी कविताएँ इनकी प्रथम पुस्तक ' नमन ' से ली गई है। इस पुअस्तक की भूमिका डॉ.अरुण प्रकाश अवस्थी जी ने लिखी है। संपर्क: 6, आशुतोष रोड, एक तल्ला, कोलकाता - 700 020 मो. 09903086968
क्रमांक सूची में वापस जाएं


5. नरेश अग्रवाल(झारखंड) की चार कविताएँ

1. यह लालटेन

सभी सोये हुए हैं
केवल जाग रही है
एक छोटी-सी लालटेन
रत्ती भर है प्रकाश जिसका
घर में पड़े अनाज जितना
बचाने के लिए जिसे
पहरा दे रही है यह
रातभर ।


क्रमांक सूची में वापस जाएं


2. परीक्षाफल

वह बच्चा
पिछड़ा हुआ बच्चा
चील की तरह भागा
अपना परीक्षाफल लेकर
अपनी मॉं के पास
एक बार मॉं बहुत खुश हुई
उसके अच्छे अंक देखकर
फिर तुरंत उदास
किताबें खरीदकर देने के लिए
पैसे नहीं थे उसके पास।


क्रमांक सूची में वापस जाएं


3. तुम्हारी थकान

इधर तुम काम बन्द करते हो
उधर सूरज अपनी रोशनी
चारों तरफ अंधेरा छा जाता है
और तुम्हारी थकान
जलने लगती है
एक मोमबत्ती की तरह ।


क्रमांक सूची में वापस जाएं


4. फुटबॉल


अचानक गोल
कुछ दर्शक चिल्लाते हैं
बहुत अच्छा हुआ
कुछ चुपचाप हैं
अपने पक्ष को
हारते देख
गेंद को थोड़ा-सा भी
अवसर नहीं
सोचने का,
वह किसका साथ दे
किसका नहीं ।


क्रमांक सूची में वापस जाएं


परिचय:
नाम: नरेश अग्रवाल,
1 दिसम्बर 1960 को जमशेदपुर में जन्मे श्री नरेश अग्रवाल मुख्यतः व्यवसाय में संलग्न रहते हुए 'कवि हृदय' को काफी सुन्दरता से उजागर किया है। आपकी कविता प्रायः देश की सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही है। जिसमे मुख्यतः वागर्थ, सबरंग, आवर्त, दस्तावेज, माध्यम, आकंठ, वर्तमान साहित्य, वसुधा, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान आदि में प्रकाशित। आप लेखन के साथ-साथ बोनसोई कला में पूर्ण रूप से दक्ष । आपकी पुस्तक "पगडंडी पर पाँव" से चार कविता यहाँ दे रहें हैं। संपर्क: रेखी मेन्शन, 8 डायगनल रोड, विष्टुपुर, जमशेदपुर- 831001 फोन. 09334825981




क्रमांक सूची में वापस जाएं


4. जवाब नेता देंगें -गोविन्द गोयल

---- चुटकी ----
बम ब्लास्ट के बारे में
पुलिस से
मत मांगों कोई जवाब,
आतंकवादियों के
प्रवक्ता तो
हमारे नेता हैं जनाब।

पहाड़िया

सुशील कुमार



(पाकुड़-साहेबगंज इलाकों की पहाड़ी जिंदगी से रू-ब-रू होकर.....,)


दिन समेटकर उतरता है थका-माँदा बूढ़ा सूरज
पहाड़ के पीछे
अपने साथ वन-प्रांतरों की निःशेष होती गाथाएँ लिये
तमतमायी उसके आँखों की ललाई पसर जाती है
जंगलों से गुम हो रही हरियाली तक
मृतप्राय नदियों में फैल रहे रेतीले दयार तक
विलुप्त हो रहे पंछियों के उजड़ रहे अंतिम नीड़ तक।
ऊँची-नीची पगडंडियों पर कुलेलती
लौटती है घर पहाड़न
टोकरीभर महुआ
दिन की थकान
होठों पर वीरानियों से सनी कोई विदागीत लिये।
उबड़-खाबड़ जंगल-झाड़ के रस्ते लौट आते हैं
बैल-बकरी, सुअर, कुत्ते, गायें भी दालान में
साँझ की उबासी लिये।
साथ लौटता है पहाड़िया बगाल
निठल्ला अपने सिर पर ढेर सा आसमान
और झोलीभर सपने लिये

क्रमांक सूची में वापस जाएं



(२)
घिर जाती है साँझ और गहरी
अंधरे के दस्तक के साथ ही
घर-ओसारे में उतर आते हैं महाजन
खटिया पर बैठ देर तक
गोल-गोल बतियाते हैं पहाड़ियों से
हँसी-ठिठोली करते घूरते हैं पहाड़नों को
फिर खोलते हैं भूतैल खाते-बहियाँ अपनी
और भुखमरी भरे जेठ में लिये गये उधार पर
बेतहाशा बढ़ रहे सूद का हिसाब पढ़ते हैं
दूध, महुआ, धान, बरबट्टी और बूटियों के दाम से
लेकर पिछली जंगल-कटनी तक की मजूरी घटाकर भी
कई माल-मवेशी बेच-बीकन कर भी
जब उरिन नहीं हो पाता पहाड़िया तो
गिरवी रख लते हैं महाजन
पहाड़न के चांदी के जेवर, हंसुली, कर्णफूल, बाले वगैरह....।
तेज उसाँसें भरता अपने कलेजे में पहाड़िया
टका देता है अपना माथा महाजन के पैर पर।
तब महाजन देते हैं भरोसा
कोसते हैं निर्मोही समय को
वनदेवता से करते हैं कोप बरजने की दिखावटी प्रार्थनाएँ
अपनेपन का कराते हैं बोध पहाड़िया को
गलबहियाँ डाले महाजन साथ मिलकर दुःख बांटने का
और संग-संग पीते हैं 'हंडिया-दारू' भी
भात के हंडियों में सीझने तक,
फिर देते हैं, एक जरूरी सुझाव जल्दी उरिन होने का,
जंगल कटाई का -
फफक-फफक असहमति में सिर हिलाता रो पड़ता है पहाड़िया
पहाड़न गुस्से से लाल हो बिफरती है
गरियाती है निगोड़े महाजन को
करमजले अपने मरद को भी
पर बेबस पहाड़िया
निकल पड़ता है माँझी-थान में खायी कसमें तोड़
हाथ में टांगी, आरा लिये निविड़ रात्रि में
भोजन-भात कर, गिदरा-गिदरी को सोता छोड़
पहाड़न से झगड़ कर
महाजन के साथ बीहड़ जंगल ।

क्रमांक सूची में वापस जाएं


(३)
रातभर दुःख में कसमसाती
अपने भीतर सपने टूटते देखती है पहाड़न
रात गिनती
मन की परत-परत गांठें खोल पढ़ती है पहाड़न
नशे में धुत्त पहाड़िया रातभर
पेड़ों के सीने पर चलाता है आरा, टांगी
और काटता रहता है अपने दुःखों के जंगल।
बनमुरगे की कुट्टियाँ नोंचते
रहरह कर दारू, बीड़ी पीते
जगे रहते हैं संग-संग धींगड़े महाजन भी रातभर।

क्रमांक सूची में वापस जाएं



(४)
शीशम, सागवान, साल की सिल्लियाँ लादे
जंगल से तराई की ओर बैलगाड़ियाँ पर कराते महाजन,
बिना दातुन-पानी किये, बासी भात और अपनी गिदरे
पीठ पर गठियाये महुआ बीनने पहाड़न,
मवेशियों को हाँक लगाता बगाल पहाड़िया
कब के उतर चुके होते हैं पहाड़ी ढलान !
बहुत सुबह, सूरज के उठान के काफी पेश्तर ही !!
खाली रहती है बहुधा पहाड़ी बस्तियाँ दिनभर
बचे रहते हैं पहाड़ पर सिर्फ़
सुनसान माँझी-थान में पहाड़ अगोरते वनदेवता
उधर पूरब में जलता-भुनता सूरज
और गेहों में लाचार कई वृद्ध-वृद्धाएँ ।


सुशील कुमार

जन्म : १३ सितम्बर, १९६४, पटना सिटी में, किंतु पिछले तेईस वर्षों से दुमका (झारखण्ड) में निवास। शिक्षा : बी०ए०, बी०एड० (पटना विश्वविद्यालय) सम्प्रति : घर के हालात ठीक नहीं होने के कारण पहले प्राइवेट ट्यूशन, फिर बैंक की नौकरी की - १९९६ में लोकसेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर राज्य शिक्षा सेवा में संप्रति +२ जिला स्कूल चाईबासा में प्राचार्य के पद पर प्रकाशन : हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में लिखने-पढ़ने में गहरी रुचि. कविताएँ कई प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित
E-Mail:sk.dumka@gmail.com

क्रमांक सूची में वापस जाएं

किस्मत की बलिहारी भइया

कुंवर प्रीतम


किस्मत की बलिहारी भइया, किस्मत की बलिहारी भइया
मेहनतकश को भूख नसीब पर, खाए जुआरी माल-मलइया
टाटा बिरला सेज बनावैं, हाथ बटावे कॉमरेड भइया
मार भगावें गरीब मजूर को, जमीन तुम्हारी काहे की भइया
भागो-भागो दूर गरीबो, देस तुम्हारा नहीं रहा अब
इंडिया शाइनिंग, इंडिया शाइनिंग, देत सुनात दिन-रात है भइया


गान्हीजी के देस में हमरी, हुई हाल ई काहे भइया
पूछा इकदिन माट साब से, बोले उड़ गई तोरी चिरइया
अब जे इस देस में रहबै, जै हिन्द बोली बन्द करौ
भारतवर्ष का वासी हौ तो, अंखियां अपनी बन्द करौ
नाम रटो इटली मइया के, सोनिया देवी कहात हैं भइया
काका कहिन हार के हमसै, ले चल जीवत मशान रे भइया
हम न जीइब अब ई कलियुग में, देस हमार ना रहा ई भइया

किस्मत की बलिहारी भइया, किस्मत की बलिहारी भइया
मेहनतकश को भूख नसीब पर, खाए जुआरी माल-मलइया
टाटा बिरला सेज बनावैं, हाथ बटावे कॉमरेड भइया
मार भगावें गरीब मजूर को, जमीन तुम्हारी काहे की भइया
भागो-भागो दूर गरीबो, देस तुम्हारा नहीं रहा अब
इंडिया शाइनिंग, इंडिया शाइनिंग, देत सुनात दिन-रात है भइया

गान्हीजी के देस में हमरी, हुई हाल ई काहे भइया
पूछा इकदिन माट साब से, बोले उड़ गई तोरी चिरइया
अब जे इस देस में रहबै, जै हिन्द बोली बन्द करौ
भारतवर्ष का वासी हौ तो, अंखियां अपनी बन्द करौ
नाम रटो इटली मइया के, सोनिया देवी कहात हैं भइया
काका कहिन हार के हमसै, ले चल जीवत मशान रे भइया
हम न जीइब अब ई कलियुग में, देस हमार ना रहा ई भइया



क्रमांक सूची में वापस जाएं

मंजिल - महेश कुमार वर्मा


1. हमें अपनी मंजिल को पाना है


हमें अपनी मंजिल को पाना है
हर चुनौती को स्वीकारना है
राह में चाहे जो भी बाधा आए
दुश्मन चाहे लाखों कांटा बिछाए
हरेक बाधा को तोड़ना है
हमें अपनी मंजिल को पाना है
जीवन में आगे बढ़ना है
जीवन में आगे बढ़ना है
हमें अपनी मंजिल को पाना है


2. अपना कर्म करते जा

अपना कर्म करते जा
जीवन में आगे बढ़ते जा
देखो कभी न तुम मुड़कर
सोचो कभी न तुम रूककर
हर परिस्थिति में बढ़ते जा
हर बाधा को तोड़ते जा
अपना कर्म करते जा
जीवन में आगे बढ़ते जा



परिचय:
नाम: महेश कुमार वर्मा,
शिक्षा : प्राथमिक / मध्य विद्यालय : राजकीय कन्या मध्य विद्यालय, छत्तरपुर, पलामू (झारखण्ड); उच्च विद्यालय : राजकीय संपोषित उच्च विद्यालय, छत्तरपुर, पलामू (झारखण्ड); मैट्रिक : राजकीय संपोषित उच्च विद्यालय, छत्तरपुर, पलामू (झारखण्ड); बोर्ड : बिहार विद्यालय परीक्षा समिति, पटना; वर्ष : 1993; इंटर --I.Sc. (Math) : B. D. Evening College, Patna; बोर्ड : Bihar Intermediate Education Council, Patna; वर्ष : 1995
वर्तमान पता: DTDC कुरियर ऑफिस, सत्यनारायण मार्केट, मारुती (कारलो) शो रूम के सामने, बोरिंग रोड, पटना (बिहार), पिन : 800001 (भारत);
Contact No. : +919955239846



क्रमांक सूची में वापस जाएं

September-08क्रमांक सूची

महेश कुमार वर्मा की दो कविताएँ
इंसान - स्मृति दुबे
श्री अखिलेश सोनी की दो क्षणिकाएँ
हालत आज क्या हो गई इंसान की
आज फ़िर चला पटाका - Dr.SK Mittal
हिन्दी दिवस समाचार - इन्दिरा चौधरी
आवाज .... - मयंक सक्सेना
श्री अशोक शर्मा की चार हास्य कविता

शम्भु चौधरी नई कविता 'शांति' विश्व की छः भाषाओं में
देवी नागरानी की दो कविता
डॉo सुरेश अवस्थी की दो कविता
जड़ें: -सुशील कुमार
श्री रंग की दो कविताऎं
आत्म-विश्लेषण - डॉ० श्यामसखा 'श्याम' मौदगल्य
सुरेन्द्र कुमार 'अभिन्न' की दो कविता
मकडियां ....- मयंक सक्सेना
कान्हा खेलत ब्रिज में - Dr.SK Mittal
कट्टरवाद - शम्भु चौधरी
ई-हिन्दी साहित्य सभा द्वारा प्रस्तुत ।। ঈ-হিন্দী সাহিত্য সভা ।। ई-हिन्दी साहित्य सभा द्वारा प्रस्तुत ।। ଈ-ହିନ୍ଦ ସାହିତ୍ଯ ସଭା ।। ई-हिन्दी साहित्य सभा द्वारा प्रस्तुत ।। ઈ-હિન્દી સાહિત્ય સભા ।। ई-हिन्दी साहित्य सभा द्वारा प्रस्तुत

महेश कुमार वर्मा के दो कविताएँ :


1. मेरे देश की कहानी


सुनो! सुनो! ऐ दुनिया वालों, सुनो! देश की नई कहानी
जहाँ रोज घटता~ ~ घोटाला! और होती बेईमानी!
भ्रष्ट्राचार संसद में नाचा, देश की हुई यही निशानी।
सुनो! सुनो! ऐ दुनिया वालों, सुनो! देश की नई कहानी
बेईमानी, घुसखोरी रग-रग में फैली
इसी पर टिकी सरकार की गाड़ी।
बढ़ रहे हैं बढ़ रहे हैं बढ़ते ही रहेंगे
भ्रष्ट्राचार को ये खिलाड़ी।
तड़पते और मरते ही रहेगें
किसान बने देश के भीखारी।
कुछ नहीं है इनका विचार
जो देश को करता हो महान।
सुनो! सुनो! ऐ दुनिया वालों, सुनो! देश की नई कहानी
जहाँ रोज घटता~ ~ घोटाला! और होती बेईमानी!
पुरुष हो या महिला, गरीब हो या लाचार
सबों के साथ हो रहा अत्याचार
यही है इनकी शक्ति का आधार
अरे! ये नई नहीं, यह बात तो है वर्षों पुरानी
यहाँ हमेशा होती रही, बेईमानी ही बेईमानी।
यही है इस देश की कहानी,
नई नहीं बस वही है कहानी
यही है मेरे देश की कहानी
यही है मेरे देश की कहानी।


2. इंसान नहीं हैवान हैं हम


इंसान नहीं हैवान हैं हम
मारते बेकसूर जीव को और
भरते अपना पेट हैं हम
इंसान नहीं हैवान हैं हम
इंसान नहीं हैवान हैं हम
मत कहो हमें सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी
हम रोज करते हैं बेईमानी ही बेईमानी
करते हैं अत्याचार
होती है बलात्कार
देते हैं रिश्वत
कोई नहीं करता है बहिष्कार
एक दिन नहीं रोज का है धंधा
पहुंचाते हैं पैसा
डालते हैं डाका
देते हैं उसे भी आधा
पैसे दो मौज मनाओ
कुछ न कहेंगे कुछ न करेंगे
अपना काम करते रहो
वे यों ही सोते रहेंगे
पीड़ित के आने पर हंटर ही लगाएंगे
वे पुलिस हैं पुलिस ही कहलाएंगे
यह थी हमारी एक झलक
होती है यहाँ अत्याचार झपकते ही पलक
अन्याय करने में सब है मतवाला
जो जितना बड़ा उसका मुँह उतना ही काला
मत कहो हमें सर्वाधिक बुद्धिमान व विवेकशील प्राणी
हम तो हैं दुनियाँ के सर्वाधिक खतरनाक प्राणी
इंसान नहीं हैवान हैं हम
कलियुग के शैतान हैं हम
कलियुग के शैतान हैं हम
इंसान नहीं हैवान हैं हम
इंसान नहीं हैवान हैं हम



परिचय:
नाम: महेश कुमार वर्मा,
शिक्षा : प्राथमिक / मध्य विद्यालय : राजकीय कन्या मध्य विद्यालय, छत्तरपुर, पलामू (झारखण्ड); उच्च विद्यालय : राजकीय संपोषित उच्च विद्यालय, छत्तरपुर, पलामू (झारखण्ड); मैट्रिक : राजकीय संपोषित उच्च विद्यालय, छत्तरपुर, पलामू (झारखण्ड); बोर्ड : बिहार विद्यालय परीक्षा समिति, पटना; वर्ष : 1993; इंटर --I.Sc. (Math) : B. D. Evening College, Patna; बोर्ड : Bihar Intermediate Education Council, Patna; वर्ष : 1995
वर्तमान पता: DTDC कुरियर ऑफिस, सत्यनारायण मार्केट, मारुती (कारलो) शो रूम के सामने, बोरिंग रोड, पटना (बिहार), पिन : 800001 (भारत);
Contact No. : +919955239846



क्रमांक सूची में वापस जाएं

इंसान - स्मृति दुबे



मुआफी चाहती हूँ काफी समय हुए कुछ लिख नहीं पायी.......लेखन वाकेई आसान कला नहीं जब उमड़ती है तो रुकने का नाम नहीं लेती और जब नहीं उमड़ना चाहती तो मन और भावनाओं को बंजर बना देती है........सच ही कहा है-


लव्ज़ एहसास से छाने लगे ये तो हद है
लव्ज़ माने भी छुपाने लगे ये तो हद है।



इन दिनों देश में कुछ इस तरह की घटनाएं हुईं कि कभी ख़ुद पर तो कभी समाज पर और कभी इसके तह में छिपी राजनीति पर कोफ़्त होता है..............क्या हम इतने अपाहिज हो चुके हैं, कुछ भी होता रहे हमारी ऑखों के सामने और हम सहने को मजबूर हैं....कोई दूसरा रास्ता नहीं सिवाय सहने के........
पर ये देश ऐसा है जहॉ ऑसुओं के साथ भी खिलवाड़ होता है........संवेदनाओं से राजनीति की जाती है.........



इस देश पर फ़क्र है हमें............
फक्र है कि हम इस देश के नागरिक हैं..........
ये देश प्रतीक है गंगा-जमुनी तहज़ीब का ........
हिन्दू-मुस्लिम-सिख-इसाई एकता का........
हिन्दी-मराठी,सभी भाषाओं और बोलियों का.........
पर क्या वाकेई ?
इस देश के टुकड़े-टुकड़े करने को तैयार हैं
यहॉ के रहनुमा।
बात सिर्फ हिन्दू और मुसलमा की नहीं है,
बात अब हिन्दी और मराठी की भी है....
बात मज़हब की ही नहीं,
बात अब भाषा की भी है
आखिर कब तक ये तांडव जारी रहेगा........
तांडव मौत का,
बेगुनाहों की मौत का ......
क्या? आप में से कोई है!
जो ज़िन्दा है...............





क्रमांक सूची में वापस जाएं

श्री अखिलेश सोनी की दो क्षणिकाएँ

गुण
नेताजी का कुत्ता
नेतागिरी के गुण
लेने लगा है,
अब भौंकने के बजाय
"स्माइल"
देने लगा है.

चुनाव
नेताजी आजकल
नींद में
बडबडाने लगे हैं,
चुनाव
नज़दीक आने लगे हैं.




अखिलेश सोनी, भोपाल
Mobile : 9993759314



क्रमांक सूची में वापस जाएं

हालत आज क्या हो गई इंसान की


ग़ज़ल

हालत आज क्या हो गई इंसान की
पैसे को दे दी जगह भगवान की

चैन से बैठा नहीं जाता है मुझसे
बात जब होती हैं हिन्दोस्तान की

अपनी जेबें भरने से फुर्सत नहीं
बात करते हैं यहाँ कल्याण की

किस कदर माहौल बदला है यहाँ
हो रही जयकार बेईमान की

आपने सब-कुछ ख़रीदा हो मगर
है नहीं कीमत कोई मुस्कान की

मत गिरो इतना भी नीचे दोस्तों
मर ना जाए रूह स्वाभिमान की




अखिलेश सोनी, भोपाल
Mobile : 9993759314



क्रमांक सूची में वापस जाएं

आज फ़िर चला पटाका



आज हिमालय की चोटी से फिर किसी ने पुकारा है
आतंकवाद के साये में जलते पड़ोसी ने ललकारा है
पूरा भारत घूम, इंडियन मुजाहिद्दीन, दिल्ली में फिर धमक गया
भारत के सपूतों ने आईएसआई की इस चुनौती को स्वीकारा किया
आतंक के सौदागरों को चेतावनी का संदेश भिजवाया है
बम फोड ले सडक खोल ले - कश्मीर हमारा है
६० साल से जालिम तुने, मासूमों पर कहर बरपाया है
हम ने, मुहतोड़ जवाब दिया और हर जगह, तुझे हराया है
खेमकरण और कारगिल के संग्राम की पिटाई तू क्या भूल गया
जम्मू सूरत, हैदराबाद या बनारस चाहे संसद तेरी मौत भूल गया
शायद खावायिश लालकिले पे चाय पीने की अभी भुला नहीं तू
शास्त्री के जय जवान की मार को आज भी याद कर तू
राम, कृष्ण, गौतम, गाँधी, तिलक, जवाहर के हम वंशज हैं जानले
सर पे कफ़न माथे पे तिलक, कमर कसे है हिंदकी सेना मानले
हमने विश्व को मानवता का सन्देश दिया
पंचशील और सद्भावना को माना और जिया
मुल्क में तेरे जमुरियत फिर से दस्तक दे रही है
बेनजीर को लुटा के इंसानियत भी रो रही है
सात समुन्द्र दूर बैठा तेरा आका आज तुझे जान गया
हम कुछ भी ना करें दुनिया का थानेदार तो डंडा तान चुका
कुरान-हदीस के पाक फतवों को भुला तू कुफ्र की वकालत कर रहा है
अपनों को भड़का के तू उन्हें क्यों नापाक नाकाम बदनाम कर रहा है
दुनिया कहाँ से कहाँ तरक्की कर गयी तू भी इसे जान ले
झूट बोलना आतंक बोना- लाशे काटना गलत है मान ले
रमजान के पाक महिने में सिजदा कर कुफ्र से तौबा मांग ले
छोड़ दे यह ओछी हरकते विनाश की,तरक्की की डगर थाम ले
मत ले इम्तहान नहीं तो तू पछतायेगा
कसम से हम उठ गए तो कौन बचायेगा
भारत वासियों मत घबड़ाना सब तुम्हारे साथ है
हम एकता, सावधानी, कठोरता, निरभ्यता, सद्भाव है
हिम्मत रखना मत घबड़ाना आतंकियों को सबक सिखाना है
जनगनमन, सत्यमेवजयते और वन्देमातरम गाना है



आज फ़िर चला पटाका

Dr. S.K. MITTAL Sri Raghvendra complex, 222/3A, Vijayanagar, 2nd Stage,
Mysore 570017 Tele: 0821-4282005-4264005-4250205 Fax 4264005
Mobile:09980246400 Res:08214246400



क्रमांक सूची में वापस जाएं

हिन्दी दिवस समाचार - इन्दिरा चौधरी

चेतना नवजागरण का
विगुल बजाने के नाम पर,
फैलाते हैं -
बलात्कार !!! , हत्या !!!
हिंसक सनसनी समाचार।
जादू टोना, अश्लीलता,
बस ये ही बच गया है
हिन्दी में समाचार।
हिन्दी को तन, मन , धन से
लगे हैं बेचने को
मकसद इनका सिर्फ
T.R.P.
सिर्फ टी.आर.पी.
मानसिक रूप से खुद
अस्वस्थ्य समाचार समूह
परोसता रहता है दिन भर
अस्वस्थ समाचार
करता रहता है मासूमों की हत्या।
फिर एक नया समाचार?
क्या यही है हिन्दी पत्रकारिता?


श्रीमती इन्दिरा चौधरी, एफ.डी. 453, साल्ट लेक सिटी, कोलकाता - 700106


क्रमांक सूची में वापस जाएं

आवाज... मयंक सक्सेना

काफ़ी दिनों से इस कविता को पूरा करने के लिए परेशान था सो आज हो ही गई ...... ये हम सबकी हकीक़त है ..... सब जो सोचा करते हैं, तो पढ़ें ....

चुप रहो
तुम्हारी आवाज़
दूसरों के कानों तक न जाए
यही बेहतर है

तुम्हारी आवाज़
हो सकता है
सच बोले
जो दूसरों को हो नापसंद
तो कर लो इसे बंद

तुम्हारी आवाज़
हो सकता है तुम्हारे पक्ष में हो
और उनको लगे
अपने ख़िलाफ़
वो करेंगे नहीं माफ़

तुम्हारी आवाज़
हो सकता है इतनी बुलंद हो
की उनके कानों के परदे फट जायें
फिर तुम्हारे साथी भी
तुमसे कट जाएँ

तुम्हारी आवाज़
दूसरी आवाजों से अलग हुई
तो
उन आवाजों को अच्छा नहीं लगेगा
वो
तब ?

तुम्हारी आवाज़ में
सवाल हो सकते हैं
सवालों से बडों का अपमान होता है
तुम्हारी आवाज़ में
अगर जवाब हुए तो
उनका हत मान होता है

तुम्हारी आवाज़
भले तुमको मधुर लगे
पर उनको ये पसंद नहीं
इसलिए
या तो चुप रहो
या फिर ज़ोर से चिल्लाओ
दुनिया को भूल जाओ
बंधन क्यूंकि
टूटने को उत्सुक है

मयंक सक्सेना द्वारा: जी न्यूज़, FC-19, फ़िल्म सिटी,
सेक्टर 16 A, नॉएडा, उत्तर प्रदेश - 201301

ई मेल : mailmayanksaxena@gmail.com


क्रमांक सूची में वापस जाएं

श्री अशोक शर्मा की चार हास्य कविता


पति-पत्नी संवाद


पति-पत्नी संवाद-1
 

परेशान पति ने पत्नी से कहा --
'एक मैं हूं जो तुम्हें निभा रहा हूँ
लेकिन अब,
पानी सर से ऊपर जा चुका है
इस लिये 'आत्म-हत्या' करने जा रहा हूँ।'
पत्नी बोली - 'ठीक है,
लेकिन हमेशा की तरह
आज मत भूल जाना,
और लौटते समय
दो किलो आटा जरूर लेते आना।


क्रमांक सूची में वापस जाएं


पति-पत्नी संवाद-2
 

पत्नी ने पति से कहा -- 'तुम रोज-रोज
नदी में छलांग लगाने की कहते हो
लेकिन आज तक तुमने छलांग लगाई? '
पति बोला -- चेलैंज मत कर
वरना करके दिखा दूंगा,
अभी मैं तैरना सीख रहा हूँ
जिस दिन आ जाएगा
छलांग भी लगा दूंगा।'


क्रमांक सूची में वापस जाएं


पति-पत्नी संवाद-3
 

पति बोला -- अगर तू
इतनी ही परेशान है
तो मुझे छोड़ क्यों नहीं देती,
ये पति-पत्नी का रिश्ता
तोड़ क्यों नही देती।
पत्नी बोली -- इतनी जल्दी भी क्या है
मेरे साजन भोले,
पहले तेरी सारी संपत्ति
मेरे नाम तो हो ले।


क्रमांक सूची में वापस जाएं


पति-पत्नी संवाद-4
 

पत्नी ने सुबह-सुबह पति को जगाया
पति बड़बड़ाया --
'दो मिनट बाद नहीं जगा सकती थी
ऎसी भी क्या जल्दी थी
कितना अच्छा सपना दिख रहा था,
राजा हरिस्चन्द्र बना मैं और मेरा परिवार
चौराहे पर बिक रह था।'
पत्नी बोली -- 'फिर,
दो मिनट में वहां कौनसी तुम्हारे लिए
रोटी सिक लेती,'
वह बोला -- बेवकूफ,
रोटी सिकती या न सिकती
पर दो मिनट में
कम से कम तू तो बिक लेती।'


क्रमांक सूची में वापस जाएं



जी-6/21, सैक्टर - 11, रोहिणी, नई दिल्ली - 110085
दूरभाष : 011 - 27573664 / 9810567146

E-Mail:ashokksharma@hpcl.co.in

शम्भु चौधरी नई कविता 'शांति' विश्व की छः भाषाओं में



By: Shambhu Choudhary, FD-453, Salt Lake City,
Kolkataa-700106. India



हिन्दी में 'शांति'



धमाके से फैली
अशांति,
फिर हर तरफ
शांति ही शांति



English: Peace
 

From the blast spread
Unrest,
Yet all around
The peace & peace



French: Paix
 

L'explosion de propagation
Les troubles,
Pourtant, tout autour de
La paix la paix



Russian: Мир
 

От взрыва распространения
Беспорядки,
Тем не менее все вокруг
Миру мир



Japanese: 平和
 

からの送風に広がる
不安、
すべての周りはまだありません
平和平和



Chinese: 和平
 

从爆炸蔓延
动乱,
然而,所有靠近
和平和平



Go to ToP

देवी नागरानी की दो कविता


जिंदगी एक रिश्ता..एक फ़ासला
 

कागज़ के कोरे पने
ज़िंदगी तो नहीं
न ही काले रंग की पुतन
का नाम है ज़िंदगी
"ज़िंदगी है एक रिश्ता"
एक लहर का दूजे से
धूप का छाँव से
दुख का सुख से
रात का दिन से
अंधेरे का रौशनी से
" जिंदगी है एक फ़ासला"
वो तो सूरज की
पहली किरन से शुरू होकर
उसी किरण के अस्त होने
तक का फ़ासला है / जीवन की हद से,
मौत की सरहद तक का फ़ासला
जिंदगी सुबह की पहली किरण है
मौत साँझ कि आखिरी किरण है
यही ज़िंदगी है / यही उसकी हद है
और सरहद भी / यही ज़िंदगी है
एक रिश्ता भी / एक फ़ासला भी


क्रमांक सूची पर वापस जाएं



फिर भर आई बदरिया
 

देखो बरसे नैना चोर
सावन की प्यासी ज्यों बदरी
वैसे प्यासा मनवा मोर
देखो बरसे नैना चोर


ऐसा प्यार करे मन पी से
चँदा से ज्यों करे चकोर
देखो बरसे नैना चोर


रुनझुन रुनझुन पायल बाजे
बैरन शोर करे उठ भोर
देखो बरसे नैना चोर


बादल गरजे घनघन घन घन
छाई घटा कारी घन घोर
देखो बरसे नैना चोर


भीनी भीनी खुश्बू छाई
महकी मस्त हवा चहूँ ओर
देखो बरसे नैना चोर


रिमझिम रिमझिम पानी बरसे
प्यासा मोर मचाए शोर
देखो बरसे नैना चोर


सावन की हरयाळी छाई
मस्त फिजाँ मेँ भीगी भोर
देखो बरसे नैना चोर


कळ कळ कळ कळ पानी बहता
प्यास बुझाए प्यासे ढोर
देखो बरसे नैना चोर


ऊँची उड़ान भरे मन ऐसे
जैसे पतँग की हो डोर
देखो बरसे नैना चोर


मदमाती मस्ती है देवी
आई है ख़ुशियों की भोर
देखो बरसे नैना चोर



Add: ९ डी, कॉर्नर व्यू सोसाइटी, 15/33 रोड,
बांद्रा, मुंबई 400052 , PH: 9867855751,


E-Mail:dnangrani@gmail.com


क्रमांक सूची पर वापस जाएं

डॉo सुरेश अवस्थी की दो कविता:


1. जाँच

नाम के आगे लिखा देख
नेता जी भी गच्चा खा गये
एक दिन सवेरे- सवेरे
इलाज कराने मेरे घर आ गये।
बोले डॉक्टर साहब!
जब से कुर्सी मिली है
भूख जाने का नाम ही नहीं ले रही है
इतना खाया है, इतना खाया है फिर भी भूख-
और खाओ, और खाओ का उपदेश सुना रही है।
पता नहीं पेट में चल रहा है कौन सा घपला।
टीएलसी,डीएलसी,ईसीजी जाँच करा ली,
लेकिन कुछ भी नहीं निकला।
मैंने कहा-
यह डॉक्टर आपको सही इलाज बातायेगा
नेता जी, एक बार 'सीबीआई' जाँच करा लो
सब कुछ निकल आयेगा।


क्रमांक सूची पर वापस जाएं



2. दोहरापन


मैंने बेटे से पूछा
विभीषण अपनी दीवारों, दरवाज़ों पर
राम-राम क्यों लिखता था, लिखवाता था?
वह बोला-
उस जमाने का समझदार नेता था
ऐसा करके वह
'रा' और 'रावण' दोनों को पटाता था
जब कोई रामा दल से आता था तो उसे
राम-राम-राम पढ़वाता था
लेकिन जब कोई रावण दल से आता था तो उसे
'रा' से रावण 'म' से मंदोदरि समझाता था
आजकल
ऐसे दोहरे चरित्र का आदमी
उन्नति कर पाता है
जो भाई की लाश पर
कुर्सी रख कर राजा बन जाता है
वैसे इतिहास
विभीषण को रामभक्त कहते हुए नहीं थकते है।
बावजूद इसके कोई भी बाप अपने बेटे का नाम
विभीषण नहीं रखता है।

क्रमांक सूची पर वापस जाएं

जड़ें

सुशील कुमार

जन्म : १३ सितम्बर, १९६४, पटना सिटी में, किंतु पिछले तेईस वर्षों से दुमका (झारखण्ड) में निवास। शिक्षा : बी०ए०, बी०एड० (पटना विश्वविद्यालय) सम्प्रति : घर के हालात ठीक नहीं होने के कारण पहले प्राइवेट ट्यूशन, फिर बैंक की नौकरी की - १९९६ में लोकसेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर राज्य शिक्षा सेवा में संप्रति +२ जिला स्कूल चाईबासा में प्राचार्य के पद पर प्रकाशन : हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में लिखने-पढ़ने में गहरी रुचि. कविताएँ कई प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित
E-Mail:sk.dumka@gmail.com


जड़ें
बढ़ती ही जाती हैं
अंधेरे में
अतल गहराईयों में
अपने आस-पास सदैव
मिट्टियों को थामे हुए।
जड़ें
बेख़बर हैं
बसंत से पतझड़ तक
पृथ्वी की उपरी सतह के हर मौसम से।
जड़ें तो
तल्लीन होकर
सोखती रही हैं
धरती का सत्वजल
और फैलाती रही हैं
निरंतर उसे
शाखाओं-प्रशाखाओं से,
लताओं-गुल्मों-फुनगियों-कल्लों तक।
जड़ें
टकरा रही हैं
पृथ्वी के गर्भ में
चट्टानों से
गर्म तैलीय लावा से
उफनते धुँओं से भी
आघात से जिसके नित
टूटते-फूट रहे हैं
जड़ों के असंख्य रोएँदार कोमल रोम।

जड़ें चाहे जितनी बेचैन रही हों
दुख:कातर और निस्सहाय भी,
पर भेदती रहती हैं सतत
धरती का सीना,
सहती जाती हैं
धरती की सीलन-तपिश,
फिर भी आकुल रहती है
हरदम
भीतर धँसने को।
पेड़ों को क्या मालुम कि
इस कठिन यात्रा में
जड़ें
मर रही हैं,
सड़ रही हैं
फ़िर भी
हर क्षण लड़ रही हैं
हर विघ्न-रोड़ों से
पेड़ों के जीवन के वास्ते।
जड़ों की चिंता
वाज़िब है,उस पर
गर्व होता होगा पेड़ों को !
हॉलाकि मालुम है सबको कि
जंगल बचे हैं जड़ों से ही
पूरी दुनिया में।
जड़ों ने
वन्य-संसार में
श्रम की संस्कृति रच रखी है
और खड़े किये हैं
अपने कंधों पर
जंगलों का गौरवमय इतिहास,
फिर भी मजलूम है
हमारे समाज में
जड़ें
जैसे दुनियाभर के इतिहास में
मेहनतकश घट्ठाये हमारे हाथ
मजलूम हैं
जिसने सिरजा है बड़े जतन से
विश्व में पूरी मानवता।
यह सोचना कितना
हैरत-अंगेज है कि
तख़त-ए-ताऊसों से इमारतों तक
जड़ों के कहीं नाम नहीं!
जहाँ भी जड़ें साबूत बची हैं
(ठूँठ बादिय़ों में भी,)
जीवन के फ़िर से
लौट आने की
वहाँ संभावना अभी अशेष है
किंतु जड़ों के नसीब में
बदा है सिर्फ़
रात की
सियाही हर क्षण
नहीं प्रकाश का एक कण।
पेड़ों को देखकर लगता है कि
जब हम भी
अपनी जड़ों से
कटने लगते हैं,
पेड़ों की तरह ही
सुखने लगते हैं
तड़पने लगते हैं,
जिजीविषा
बेचैन हो उठती हैं
हममें भी।
जड़ें मरकर भी
हमारी मिट्टी को पकड़े रहती हैं
और हमारी नीवों को
स्खलन से बचाती हैं,
हमारे पुरखों के किये-धरे की तरह।
किसको पता नहीं कि
जिनकी जड़ों में
रोगाणु लग जाते हैं
उनके साबूत बचने के आसार
कम ही रहते,
उन वृक्षों को घुन लग जाते है।

क्रमांक सूची पर वापस जाएं

श्री रंग की दो कविताऎं


1. पगली


सुबह, गली के लड़के
ढेला मार रहे थे
चिढ़ा रहे थे
वह भी खदेड़ रही थी
बड़बड़ाती.......
दोपहर में,
घूम रही थी बाजार में,
मांग रही थी कुछ खाने को
दुत्तकार रहे थे उसे सभ्य लोग।
शाम ढले,
वह पार्क के बेंच पर बैठी
कुछ खा रही थी चुपचाप
वहाँ उसे कोई ढेला नहीं मार रहा था
दुत्कार नहीं रहा था कोई
कोई नहीं कर रहा था घिन.....
रात गये,
आग की तरह, तापी जा रही थी पगली।

क्रमांक सूची पर वापस जाएं




2. पिता, रोटी और बच्चे


दिन भर हाथ पैर मारते पिता
बोलते झूठ सच किसी तरह करते
पेट भरने का प्रबन्ध.....
देर रात घर लौटने पर माँ
नोचने लगती पिता का मूँह
वरक्कत नहीं होता पिता की कमाई में
परई भररहती दिन भर की
परई भर ही रहती
देर रात तक खटने पर
अपने करम पर रोती माँ
पर रो नहीं पाते खुलकर पिता
सारा गुस्सा उतारते माँ पर
माँ खीज उतारती बच्चों पर...
दिन रात खटे पिता खटती माँ
किस्मत को कोसते
देर रात गये चूल्हा जलाती मँ
बनाती जो मिला होता सीधा-पिसान
डरे सहमे चुपचाप का लेते जो मिलता बच्चे
खाली आतों में पानी भर कर सो जाती माँ
कितनी बार.....




9/12 EWS, कबीर मंदिर रोड,
प्रीतम नगर, इलाहाबाद
साभार:'सम्यक'

क्रमांक सूची पर वापस जाएं

आत्म-विश्लेषण

श्यामसखा 'श्याम'


भला लगता है
आंगन में बैठना
धूप सेंकना

पर इसके लिये
वक़्त कहां ?
वक़्त तो बिक गया
सहूलियतों की तलाश में
और अधिक-और अधिक
संचय की आस में

बीत गये बचपन जवानी
जीवन के अन्तिम दिनों में
हमने वक़्त की कीमत जानी
तब तक तो खत्म हो चुकी थी
नीलामी

हम जैसों ने खरीदे
जमीन के टुकड़े
इक्ट्ठा किया धन
देख सके न
जरा आँख उठा
विस्तरित नभ
लपकती तड़ित
घनघोर गरजते घन
रहे पीते धुएं से भरी हवा
कभी देखा नहीं
बाजू मे बसा
हरित वन

पत्नी ने लगाए
गमलों में कैक्टस
उन पर भी
डाली उचटती सी नज़र

खा गया
हमें तो यारो
दावानल सा बढ़ता
अपना नगर

नगर का
भी, क्या दोष
उसे भी तो हमने गढ़ा
देखते रहे औरों के हाथ
बताते रहे भविष्य
पर अपनी
हथेली को
कभी नहीं पढ़ा

क्रमांक सूची पर वापस जाएं



डॉ० श्यामसखा'श्याम' मौदगल्य का संक्षिप्त परिचय

जन्म-अगस्त २८,१९४८[अप्रैल १,१९४८विद्यालयी रिकार्ड में]
जन्म स्थान-बेरी वालों का पेच रोहतक
जननी-जनक: श्रीमति जयन्ती देवी,श्री रतिराम शास्त्री
शिक्षा -एम.बी; बी.एस ; एफ़.सी.जी.पी.
सम्प्रति- निजी नर्सिंग होम
लेखन-
भाषा- हिन्दी,पंजाबी,हरयाणवी व अंग्रेजी में
प्रकाशित पुस्तकें- ३ उपन्यास[नवीनतम-कहां से कहां तक-प्रकाशक-हिन्द पाकेट बुक्स]
२ उपन्यास ,कोई फ़ायदा नहीं हिन्दी,समझणिये की मर-
हरयाण्वी में साहित्य अकादमी हरयाणा द्वारा पुरस्कृत
३ कथा संग्रह-हिन्दी-अकथ ह.सा.अकादमी द्वारा-पुरस्कृत
१ कथा संग्रह इक सी बेला-पं.सा अका.द्वारा पु.
५ कविता संग्रह प्रकाशित-एक ह,सा.अ.द्वारा अनुदानित
१ ग़ज़ल संग्रह-दुनिया भर के गम थे
१ दोहा-सतसई-औरत वे पांचमां[हरियाण्वी भाषा की पहली दोहा सतसई]
१ लोक-कथा संग्रह-घणी गई-थोड़ी रही-ह.सा.अका.[अनुदानित]
१ लघु कथा संग्रह-नावक के तीर-ह.सा.अका[अनुदानित]
चार कहानियां ह.सा अका.२ तीन-पंजाबी सा.अका द्वारा पुरस्कृत
एक उपन्यास-समझणिये की मर'-एम.ए फ़ाइनल पाठ्यक्रम[कुरुक्षेत्र वि.विद्यालय मे]
मेरे साहित्य पर एक शोध-पी एच डी हेतु,तीन एम.फिल हेतु सम्पन्न।
सम्पादन-संस्थापक संपादक-मसि-कागद[प्रयास ट्रस्ट की साहित्यिक पत्रिका]-दस वर्ष से
कन्सलटिंग एडीटर-एशिया ऑफ़-अमेरिकन बिबिलोग्राफ़ीक मैगज़ीन-२००५ से
सह-संपादक-प्रथम एडिशन-रोह-मेडिकल मैगज़ीन मेडिकल कालेज रोहतक-१९६७-६८
सम्मान -पुरुस्कार
१ चिकित्सा- रत्न पुरस्कार-इन्डियन मेडिकल एसोशिएशन का सर्वोच्च पुरुस्कार-२००७
२ पं लखमी चंद पुरस्कार[ लोक-साहित्य हेतु]-२००७
३ छ्त्तीस गढ़ सृजन सम्मान[मुख्यमंत्री डॉ० रमन सिंह द्वारा]-२००७
४ अम्बिका प्रसाद दिव्य रजत अलंकरण-२००७
५-कथा बिम्ब-कथापुरस्कार मुम्बई,
६ राधेश्याम चितलांगिया-कथा पुरस्कार- लखनऊ
६ संपादक शिरोमिणि पु.श्रीनाथद्वारा-राजस्थान
सहित-लगभग २५ अन्य सम्मान पुरस्कार
अध्यक्ष[प्रेजिडेन्ट]=इन्डियन मेडिकल एसोशियेशन हरियाणा प्रदेश;२साल१९९४-९६
संरक्षक- इंडियन,मेडि.एसो.हरियाणा-आजीवन
सदस्य-रोटरी इन्टरनेशनल व पदाधिकारी
सदस्य कार्यकारणी-गौड़ब्राह्मण विद्याप्रचारणी सभा
सम्पर्क- मसि-कागद १२ विकास नगर रोह्तक १२४००१
घुमन्तू भाष-०९४१६३५९०१९ .
E-Mail:shyamskha@yahoo.com


क्रमांक सूची पर वापस जाएं

सुरेन्द्र कुमार'अभिन्न'की दो कविता



आसमान से ऊँचे

 

आसमान से ऊँचे हरदम, और सागर से गहरे रिश्ते
मिट जाते दिल के अंधेरे होते हैं बड़े सुनहरे रिश्ते
खून के रिश्तों से बढ़कर, होते है दिल के गहरे रिश्ते
मेंहदी रिश्ते, पायल रिश्ते, और होते हैं गजरे रिश्ते
रिश्तों के निगहबान है रिश्ते,रिश्तों पे होते पहरे रिश्ते
गांव छोटे पर गहरे रिश्ते, शहर बड़ा और छोटे रिश्ते





मेरा बचपन

 

कोई खिलौना सा टूट गया है मेरा बचपन
टूटे खिलोने सा कहीं छुट गया है मेरा बचपन
कितना खुश था, कितना सुख था बचपन की उन बातों में
समय का जालिम चेहरा आकर लूट गया मेरा बचपन
हंसता खिलता सबसे मिलता, एक जिद्दी बच्चे जैसा
जाने किस की नज़र लगी और रूठ गया मेरा बचपन
गुल्ली डंडा, गोली कंचा, डोर पतंग सी उमंग लिए
रंग बिरंगे गुब्बारों सा था, क्यूँ फूट गया मेरा बचपन




- सुरेन्द्र कुमार'अभिन्न'
शिक्षा ..अंग्रेजी भाषा और साहित्य में M.A. व M.Phil.
पर्यटन प्रबंधन में स्नातकोत्तर (M.T.A.)
स्थान: अम्बाला
व्यवसाय: हरियाणा सरकार के आबकारी व कराधान विभाग में
आबकारी व कराधान अधिकारी .. एवं .. कर निर्धारण प्राधिकारी
के पद पर सेवारत

E-Mail: sure_234@hotmail.com


क्रमांक सूची पर वापस जाएं

मकडियां


मयंक सक्सेना
Zee News Ltd., FC - 19, Sector 16A, Noida
09311622028


सन्नाटे के शोर से कानो को पकड़
दांतों को भींचता
सामने के भयानक दृश्य
देख न पाने की हालत में
आंखों को मींचता
इधर उधर
हर तरफ़ .... जहाँ देखो
या न देखो
सब कहीं झूठ .... धोखा
लोग होते जाते और और और
मक्कार
सब हैं अय्यार
अंधेरे में पूरे बदन पर रेंगती हैं
फंसाने को
शिकार बनाने को
जाल बुनती हैं
हजारों मकडियां
दरो दीवारों पर ......
दिलो की दीवारों पर !

क्रमांक सूची पर वापस जाएं