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डॉ.गुलाबचंद कोटड़िया की कविताएँ



डॉ.गुलाबचंद कोटड़िया का जन्म 07 अगस्त 19935 लोहावट गांव जिला जोधपुर (राजस्थान) में हुआ । आपकी शिक्षा: अजमेरे इंटर, विशारद (बी.ए.हिन्दी)
आपकी अबतक निम्न पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है।
पाँच हिन्दी कहानी संग्रह
1. रो मत अक्कल बाई 2. बाई तूं क्यों आई? 3. भावनाओं का खेल 4. विधि का विधान 5. जंग खाए लोग
पाँच हिन्दी कविता संग्रह
संवेदना के स्वर, ठूंठ की आशीष, मिट्ती के रंग हज़ार, रहुँ न रहुँ और रेत की पीड़ा
एक राजस्थानी कविता संग्रह: देश री सान-राजस्थान
एक राजस्थानी कहानी संग्रह: थोड़ा सो सुख
छह बाल साहित्य की पुस्तकें:
101 प्रेरक प्रसंग, 101 प्रेरक कथाएं, 101प्रेरक पुंज, प्रेरणा दीप, 101 प्रेरक बोध कथाएं और 101 प्रेरेक कहानियां
तीन निबन्ध संग्रह:
घूमता आईना, जीवन मूल्य और दाम्पत्य ज्यामिति (शीघ्र प्रकाश्य)
आकाशवाणी चेन्नई एवं दिल्ली से रचनाएं प्रसारित। दूरदर्शन मैट्रो से स्वलिखित नाटक में अभिनय। सौ से अधिक काहानियां व लगभग 750 लेख, कविताएंविभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।
सम्मान:
साउथ चक्र, राजस्थानी एसोसियशन तमिलनाडु द्वारा 'राजस्थान श्री', तमिलनाडु हिंदी अकादमी, भारती भूषण, रामवृ्क्ष बेनीपुरी जन्म शताब्दी सम्मन, हिंदी सेवी सम्मन, साहित्यानुशीलन समिति राजस्थानी भाषा में डी.आर.लिट्, सुभद्राकुमारी चौहान जन्म शताब्दी सम्मन, भाषा रत्न सम्मन, साहित्य महोपाध्याय, भारती भूषण एवं अन्य कई सम्मान।
संप्रति: स्वतंत्र लेखन
पता: 469, मिंट स्ट्रीट, चेन्नई- 600079. फोन: 044-25203036


इनकी दो कविताएँ:


बूंद


बूंद
गिरी धरती पर
सौख़ ली गई
मानव पर पोंछ ली गई
समुन्दर में लुप्त हो गई
पेड़ पौधों की जड़ों में
जीवन दायिनी बन गई।
पत्ते पर गिरी
थोड़ी देर मोती सी चमकी
सूर्य की गरमी से
वाष्प बन उड़ गई।
एक बूंद विष मृत्यु की गोद में सुला देती है,
एक बूंद अमृत अमर बना देती है,
यह भी किसी ने नहीं जाना
बूंद को किसी ने
महत्व नहीं दिया,
वह क्रंदन कर उठी
लोग क्यों नहीं
कहतें हैं वह महान है।
बूंद बूंद घड़ा भरता है
क्या वे उससे भी अनजान हैं?


अग्नि नक्षत्र


तमिलनाडु में व
दक्षिणी प्रदेशों में
ग्रीष्म ऋतु में
एक महीना अग्नि नक्षत्र
प्रति वर्ष लगता है।
लगता तो पूरे भारत में होगा
परन्तु अहम् खास यहीं पा गया।

झूलसते हैं लोग
उनके जीव फ्ड़फ्ड़ाते हैं
भूमि, जीव-जन्तु, घास, पेड़,
पशु-पक्षी, उस महीने में
त्रस्त हो जाते हैं भयंकर
गर्मी से तोबा-तोबा कर उठते हैं।

पशु पक्षियों को तो छाया भी
विश्राम हेतु मिल जाती है
दैनिक मजदूरों को भरगर्मी में
पसीने में सराबोर होते हुए
काम करना ही होता है
जिनके पास
खाने को सुबह है तो शाम नहीं
उनके लिए अग्नि नक्षत्र का
कोई महत्व नहीं होता
होता है तो भी मजबूर है
हाँ धनी संपन्न लोग
सुविधा प्राप्त होने के कारण
एयरकंडीशनर कमरों में दुबक जाते हैं
ठंढे की तरह।



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