मुट्ठी में बंधी रेत की तरह
फिसल रहा है हाथ से
समय
बँधा क्यूं नही रहता
कुछ ख़ूबसूरत लम्हो की तरह
समय बहता रहता है दरिया की तरह
समय
पलट कर नही आता
नही दिखता गुज़रे वक़्त की परछाई
दर्पण में पड़ी लकीरो की तरह
2. उमंग
बसन्त की उमंगों में
इन्द्रधनुषी रंगों में
बस तेरा नाम महकता है.............
सावन की फुहरों में
मन वीणा के तारों में
तेरी ही धुन बजती है................
उषा की अरूणाई में
सुनहली चम्पई साँझ में
तुम ही तुम शामिल हो............
मलयज पवन के झोंकों में
महकी मदिर बयार में
तुम्हारें ही अहसास है.............
ई. नीलिमा गर्ग
Address:
Er . neelima garg
chander road dalanwala
dehradoon
I am an engineer by profession . I always found Hindi interesting so writing poems in hindi to give voice to my feelings.