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मुझे जीने दो-चीख -सौ.पूनम संजय सारडा

माँ मुझे भी जीना था,
छवि तेरी बनके रहना था
कोख में जब तेरे मैया, मैने पहली ली करवट
एहसास ने मेरे, होठों पे तेरे दी थी हल्की सी मुस्कुराहट
मालूम नहीं था जिंदगी का, पल वो बहुत ही छोटा था।।
माँ मुझे भी जीना था-2
सच कहूँ माँ कोख पे तेरी जब हुआ
पहला वो वार
मुँह से निकल भी न पाया
एक हल्का सा भी चित्कार
कतरा कतरा बह रहा था
खून वो मैया तेरा ही था।।
माँ मुझे भी जीना था-2
देती मुझे जनम तू मैया
बनती में लाठी तेरे बुढापे की
एक ही क्या, बनती में शोभा
मैया दोनों की घर की
मेंहदी रचाकर हाथों में मैया
ससुराल में जाना था
मुझको भी तो माता बनकर, ममता का
अनुभव लेना था।।
माँ मुझे भी जीना था-2
‘‘वंश का दीपक ना सही,
बन सकती थी मैं दीये की ज्योति’’
ना बहाती/गँवाती मेरी याद में मैया
अपनी आँखो के तू मोती
करके बगावत जमाने से मैया, भविष्य मेरा चुनना था।।
माँ मुझे भी जीना था-2
कोई नहीं है अब तो शिकायत
करू शिकायत तो किससे?
स्त्री जीवन का श्राप था पाया
मैंने अपनी तकदीर से
हे भगवान, गर यही था जीवन,
तो ये जीवन कभी न देना था।।
माँ मुझे भी जीना था-2
चीख मेरी बच्ची की सुनाकर, गर बचाऊँ किसी मासूम की जान
यह बच्ची ही लौटाएगी जो, खोया था मैंने आत्मसम्मान
अभी तक गूँज रही कानों में उस बच्ची की वो तान।।
माँ मुझे भी जीना था-2


242, महावीर नगर, वखार भाग
गुजराती हाईस्कुल के आगे, सांगली
मो.-9325584010