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जिनगानी रा च्यार दिन -रामनिरंजन शर्मा ‘ठिमाऊ’

जद जाम्या तो मावड़ी हिवड़ै हरख मनायो।
घणैं चाव सूं बठा गोद में, म्हानै दूधो प्यायो।।
सुध बुध कोई थी नहीं, था कोरा अणजाण।
न कोई नै जाणता, नै थी जाण पिछाण।।
जद भी भूख सतावती, रोता मार चिंघाड़।
मायड़ चूंची देवती, चोली रोज उघाड़।।
आँगलड़ी पकड़ाकर, पायेपा चलवायो।
हळवा हळवा म्हारी जामण झालो देर बलायो।।
जद होग्या मोट्यारिया, दड़ाछंट ही भाग्या।
घणी लगाई हड़बड़ी, सूत्या गिंडक जाग्या।।
रूखां चढ़ता, भागता, करता भोत किलोल।
रोज छबाक्यां कूदता, करता रापट रोल।।
आभै नै छू लेण री, मनड़ै में भी आस।
मिनख मांछरा लागता, म्हें करता उपहास।।
नस-नस में थी ताजगी, थो म्हांनै घणो गुमान।
पोरी-पोरी नाचती, जद म्हे था छिक्क जुवान।।
दूध दही में चूरके, बाजरियै रा रोट।
कूद कूद के खांवता, बणता जबर घिलोट।।
थूक मूंठियां भागता जाता कोसां पार।
ठीडै जूती झड़कावता, कदी न आती हार।।
लोग कैवता गाबरू अर देता काम उढाय।
दूध मोकलो होवतो, रैती भैस्यां गाय।।
हचकड़ियाँ पाणी काडता, भरता घड़ला मांट।
वो किलकी रो तावड़ो, बळती म्हारी टाट।।
जाड़ो कदी न लागतो, कदी न ठिरतो डील।
फटकारै ही पूगता, कदी न करता ढील।।
ऊठक-बैठक काडता और पेलता डंड।
भर स्यालै री टेम में बकर्याँ चरती ठंड।।
भाभ्याँ सागै टिचकली अर करतां घणां चबोड़।
वै भी हंसती-मुळकती करती भोत मरोड़।।
च्यार दिनां री च्यांनणी गई जुवानी बीत।
म्हे तो अब अघखड़ हुया, या दुनियां री रीत।।
माथै पर सिलवट पड़ी, हुया किरडकाबरा बाल।
म्हानै दरपण देखता, खुद पर आवै झाल।।
चोबारै रो सोवणो, होग्यो म्हारो बंद।
बैठ तिबारी सोचर्यो, चाल हुई है मंद।।
अब टाबरिया कैवण लाग्या, म्हानै चाचो ताऊ।
टेम बड़ी बलवान है, रैवै नहीं टिकाऊ।।
बा फुड़ती कोसां गई, गया तावळा साल।
हुयो अड़गड़ै साठ कै, पिचक्या दोन्यूँ गाल।।
अब तो म्है दादो बण्यो, हाडां दियो जवाब।
फेरू कदी न आयसी, सोनै जेड़ी आब।।
संगी-साथी सै गया, गया डील रा स्वाद।
खाल सिमट गुदड़ो बणी, बणी जुवानी याद।।
सूकी निरबल देह रो, हुयो खाट सूं प्यार।
अब तो म्हारो भायलो बण्यो बुढापो यार।।
बाल युवा अर डोकरो, बण्या रूप है तीन।
पैला दो मस्ती करैं, तीजो बणज्या दीन।।
लाठी लेके चालतां, डगमग हालै नाड़।
जिनगानी जर जर हुई, ज्यूं खेत पुराणी बाड़।।