प्रेम भाव का शुचि प्रवाह हो, दूर रहें हर द्वेष-जलन से।।
वर्ण भले ही अलग-अलग हो, अलग-अलग हो बोली-बानी।
किन्तु हृदय में स्नेह-भाव की, बहे सतत् धारा कल्याणी।।
अब कल्याण नहीं हो सकता, इस कोरे बाहरी मिलन से।
एक दूसरे के पर्वों को, मिलकर अपना पर्व बनाएँ।।
छँटे घना असान अँधेरा, हिलमिल होली-ईद मनाएँ।
साल-साल मुस्काना सीखें, उपवन के हर एक सुमन से।।
कोई भटके नहीं कहीं पर, सारे सूत परस्पर जोड़ें।
समरसता के व्यवहारों में, राजनीति का नाटक छोड़ें।।
विनय, दया, करुणा अपनाएँ, बहें सुवासित मलय पवन से।
राहें भले अलग हों सबकी, किन्तु लक्ष्य है एक सभी का।।
कम न सिवईयों की मिठास हो, रंग न हो होली का फीका।
चूक गए तो क्या कह कर हम, माँग सकेंगे क्षमा वतन से।।
- हितैषी स्मारक सेवा समिति
गंजमुरादाबाद-उन्नाव, उ0प्र0-41502