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बकरे की जुबान - महेश कुमार वर्मा

देख देख इस मुर्ख मनुष्य को!!
करता है ये छठ पर्व
चाहता है हजारों कामना
छठ करने के लिए
कितनी सारी व्यवस्था करता है
भगवान से हजारों कामना चाहता है
खरना करता है

उपवास करता है
नदी जाता है
सूर्य को अर्ध्य देता है
ताकि उसकी मनोकामना पूर्ण हो
पर उसका नहाय-खाय
खरना, उपवास
व सूर्य को अर्ध्य देना
सब तब हो जाता है बेकार
जब छठ के तुरत बाद
वह भूल जाता है
अपने धर्म व कर्म को
और करता है
मुझपर बेवजह प्रहार
सिर्फ मैं ही नहीं
मुझ जैसे हजारों

बकरे मारे जाते है
छठ के पारण दिन
लेते हैं ये निर्दयी मनुष्य
बेवजह हमारी जान
नहीं है इन्हें अपने धर्म की पहचान!
नहीं है इन्हें अपने धर्म की पहचान!!

मुर्ख मनुष्य
करके हमारा बध
छठ के अपने पुण्य को
खुद मिटा देता है
और ले आता है
अपने खाते में
सिर्फ पाप ही पाप!

अरे मुर्ख व पापी मनुष्य!

हमें मारकर तुम
तरक्की कर सकते नहीं
शांत तुम रह सकते नहीं
चैन से सो सकते नहीं!
चैन से सो सकते नहीं!!


अरे निर्दयी व कातिल मनुष्य
मेरी गलती मुझे बताओ
मेरा अपराध मझे बताओ
तुमने हमें क्यों मारा?

मुझ बेगुनाहों को क्यों रुलाया?
मुझ बेगुनाहों को क्यों रुलाया??

कहता है तुमसे ये बकरा
अपना भविष्य तुमने ख़ुद है उकेरा
अवश्य मिलेगा तुम्हें हमें मारने का फल

अवश्य मिलेगा तुम्हें हमें मारने का फल
जाएगा तुम्हारा सारा व्रत निष्फल!
जाएगा तुम्हारा सारा व्रत निष्फल!!




रचयिता : महेश कुमार वर्मा

1 comment:

anitakumar said...

हमें मारकर तुम
तरक्की कर सकते नहीं
शांत तुम रह सकते नहीं
चैन से सो सकते नहीं!
चैन से सो सकते नहीं!!

hum bhi masaanhaar ke khilaaf hain