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मकडियां


मयंक सक्सेना
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सन्नाटे के शोर से कानो को पकड़
दांतों को भींचता
सामने के भयानक दृश्य
देख न पाने की हालत में
आंखों को मींचता
इधर उधर
हर तरफ़ .... जहाँ देखो
या न देखो
सब कहीं झूठ .... धोखा
लोग होते जाते और और और
मक्कार
सब हैं अय्यार
अंधेरे में पूरे बदन पर रेंगती हैं
फंसाने को
शिकार बनाने को
जाल बुनती हैं
हजारों मकडियां
दरो दीवारों पर ......
दिलो की दीवारों पर !

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2 comments:

ई-हिन्दी साहित्य सभा said...

शुभकामना स्वीकार करें - शम्भु चौधरी

"SURE" said...

हर तरफ़ .... जहाँ देखो
या न देखो
सब कहीं झूठ .... धोखा
लोग होते जाते और और और
मक्कार
सब हैं अय्यार
अंधेरे में पूरे बदन पर रेंगती हैं
फंसाने को
शिकार बनाने को
जाल बुनती हैं
हजारों मकडियां
मयंक जी कमाल की imagry प्रस्तुत की है आपने आज के ज़माने की सच्चाइयों का सजीव चित्रण
मनुष्य की फितरत का मकडी से प्रतीकात्मक रिश्ता .....सोचने पे मजबूर कर देने वाली रचना ..बधाई हो