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दो गीत -डॉ. मोहन ‘आनन्द’

एक
इस कुहासे को हटाना चाहता हूँ।
इक नया सूरज उगाना चाहता हूँ।

छा गई बदली अंधेरे की यहाँ।
ढूंढते न मिल रहा है पथ कहाँ?
आँख पर पट्टी बंधी सी लग रही।
बात सुनकर भी लगे ज्यों अनकही।
आँख से पर्दा उठाना चाहता हूँ।
इक नया सूरज उगाना चाहता हूँ।

खुद करें गलती मगर क्यों दोष दूजों पर मढ़ें।
बांधकर फंदा स्वयं फिर शूलियों पर जो चढ़ें।
वक्त की करवट कहें या आदमी की भूल।
हो रहा मजबूर है क्यों चाटने को धूल।
आदमी को आदमी का कद दिखाना चाहता हूँ।
इक नया सूरज उगाना चाहता हूँ।

चूक जायेगा समय तब, क्या समझ में आयेगा।
सूखने के बाद क्या पानी दिया हरयाएगा।
लुट चुके को भागने से क्या मिलेगा बताओ?
होश मे आओ स्वयं मत आग खुद घर में लगाओ।
हो चुके बेहोश उनको होश लाना चाहता हूँ।
इक नया सूरज उगाना चाहता हूँ।

तुम बनो सूरज मिटा डालो अंधेरा।
बीत जाए रात काली हो सवेरा।
प्रलय की पहली किरण झंकार करदो।
बुझ चुके हारे दिलों में प्यार भरदो।
शाख उजड़ी पर नई कोंपल उगाना चाहता हूँ।
इक नया सूरज उगाना चाहता हूँ।


दो
बची न कोई चाह जला दो होंठ न खोलूँगा।
बहुत चुका हूँ बोल आज मैं कुछ न बोलूँगा।


पीड़ाओं ने भीम बनाया अपमानों ने दुर्योधन।
जितने कष्ट मिले उतने ही थे अपनों के सम्बोधन।
काटा और जलाया तन छिद्रोंमय कर डाला।
मधुर बना संगीत पिलाई होंठों की हाला।

बची न कोई चाह जला दो होंठ न खोलूँगा।
बहुत चुका हूँ बोल आज मैं कुछ न बोलूँगा।


तपती लू में एक बूँद को, दौड़-दौड़ हारा।
जितना दर्द मिला अपनों से, हँसकर स्वीकारा।
वो देते उपकार मानकर, मैं लेता एहसान।
जिस बखरी में जिया आज तक वह दिखती शमशान।

सेज नहीं स्वीकार, चिता पर हँसकर सो लूँगा।
बहुत चुका हूँ बोल आज मैं कुछ न बोलूँगा।


मैं न कभी भीड़ में याचक बनकर खड़ा हुआ।
कभी समेटा नहीं स्वप्न न लाया पड़ा हुआ।
मुट्ठी में लेकर सूरज को बार-बार भींचा।
सारा जीवन सिर्फ चक्षुओं के जल से सींचा।


चाह नहीं अमृत की श्रमकण से मुँह धो लूँगा।
बहुत चुका हूँ बोल आज मैं कुछ न बोलूँगा।


सुन्दरम बंगला, 50 महाबली नगर,
कोलार रोड भोपाल (म.प्र.)