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कृष्ण कुमार यादव की चार कविताएँ

k.k.yadav जीवनवृत्त:

कृष्ण कुमार यादव: जन्म: 10 अगस्त 1977, तहबरपुर, आजमगढ़ (उ0 प्र0), शिक्षा: एम0 ए0 (राजनीति शास्त्र), इलाहाबाद विश्वविद्यालय विधा: कविता, कहानी, लेख, लघुकथा, व्यंग्य एवं बाल कविताएं। प्रकाशन: देश की प्राय अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन। एक दर्जन से अधिक स्तरीय काव्य संकलनों में रचनाओं का प्रकाशन। विभिन्न वेब पत्रिकाओं- सृजनगाथा, अनुभूति, अभिव्यक्ति, साहित्यकुंज, साहित्यशिल्पी, काव्यांजलि, रचनाकार, हिन्दी नेस्ट, स्वर्गविभा, कथाव्यथा, युगमानस, वांग्मय पत्रिका, कलायन, ई-हिन्दी साहित्य इत्यादि पर रचनाओं का नियमित प्रकाशन। प्रसारण: आकाशवाणी लखनऊ से कविताओं का प्रसारण। कृतियाँ : अभिलाषा (काव्य संग्रह-2005), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह-2006), इण्डिया पोस्ट- 150 ग्लोरियस इयर्स (अंगेरजी-2006), अनुभूतियाँ और विमर्श (निबन्ध संग्रह-2007), क्रान्ति यज्ञ: 1857-1947 की गाथा (2007)। बाल कविताओं व कहानियों का संकलन प्रकाशन हेतु प्रेस में।
इनकी चार कविताएँ


1. गौरैया
चाय की चुस्कियों के बीच
सुबह का अखबार पढ़ रहा था
अचानक
नजरें ठिठक गईं
गौरैया शीघ्र ही विलुप्त पक्षियों में।

वही गौरैया,
जो हर आँगन में
घोंसला लगाया करती
जिसकी फुदक के साथ
हम बड़े हुये।

क्या हमारे बच्चे
इस प्यारी व नन्हीं-सी चिड़िया को
देखने से वंचित रह जायेंगे!
न जाने कितने ही सवाल
दिमाग में उमड़ने लगे।

बाहर देखा
कंक्रीटों का शहर नजर आया
पेड़ों का नामोनिशां तक नहीं
अब तो लोग घरों में
आँगन भी नहीं बनवाते
एक कमरे के फ्लैट में
चार प्राणी ठुंसे पड़े हैं।

बच्चे प्रकृति को
निहारना तो दूर
हर कुछ इण्टरनेट पर ही
खंगालना चाहते हैं।

आखिर
इन सबके बीच
गौरैया कहाँ से आयेगी?

2.जज्बात
वह फिर से ढालने लगा है
अपने जज्बातों को पन्नों पर
पर जज्बात पन्ने पर आने को
तैयार ही नहीं
पिछली बार उसने भेजा था
अपने जज्बातों को
एक पत्रिका के नाम
पर जवाब में मिला
सम्पादक का खेद सहित पत्र
न जाने ऐसा कब तक चलता रहा
और अब तो
शायद जज्बातोें को भी
शर्म आने लगी है
पन्नों पर उतरने में
स्पाॅनसरशिप के इस दौर में
उन्हें भी तलाश है एक स्पाॅन्सर की
जो उन्हें प्रमोट कर सके
और तब सम्पादक समझने में
कोई ऐतराज नहीं हो।

3. मैं उड़ना चाहता हूँ
मैं उड़ना चाहता हूँ
सीमाओं के बंधन से स्वतंत्र
उन्मुक्त आकाश में।

उस जटायु की तरह
जिसने सीता की रक्षा के लिए
रावण से लोहा लिया।

उस यान की तरह
जो युद्धभूमि में दुश्मनों के
छक्के छुड़ा देता है।

उस कबूतर की तरह
जो शान्ति का प्रतीक है।

उस मेघदूत की तरह
जिससे कालिदास के विरही यक्ष ने
अपनी यक्षिणी को पैगाम पहुँचाया।

उस बादल की तरह
जिसे देखते ही
किसन की बाछें खिल जाती हैं
और धरती अन्न-रस से भरपूर हो जाती है।

4. मोक्ष
सागर के किनारे वह सीप
अनजानी सी पड़ी है
ठीक वैसे ही
जैसे शापित अहिल्या
पत्थर बनकर पड़ी थी
एक नन्हीं सी बूँद
पड़ती है उस सीप पर
और वह जगमगा उठती है
मोती बनकर
ठीक वैसे ही, जैसे शापित अहिल्या
प्रभु राम के पाँव पड़ते ही
सजीव हो जगमगा उठी थी
यही मोक्ष है उसका
पर वाह रे मानव
वह हर सीप में मोती खोजता है
हर पत्थर को प्रभु मान पूजता है
पर वह नहीं जानता
मोक्ष पाना इतना आसान नहीं
नहीं मिलता मोक्ष बाहर ढूँढने से
मोक्ष तो अन्तरात्मा में है
बस जरूरत है उसे एक बूँद की
ताकि वह जगमगा उठे।

कृष्ण कुमार यादव
भारतीय डाक सेवा,
वरिष्ठ डाक अधीक्षक,
कानपुर मण्डल, कानपुर-208001
kkyadav.y@rediffmail.com

2 comments:

Mrs. Asha Joglekar said...

सुंदर कविताएँ । गोरैया वाली विशेष पसंद आई ।

रावेंद्रकुमार रवि said...

कहीं से भी आए,
पर आएगी,
अवश्य आएगी गौरइया!
यदि आप तैयार हो जाएँ
अपने रोशनदान से जाली
और
छत से पंखा हटाने के लिए!