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यदि तोर डाक शुने केउ ना आसे



कविवर रविन्द्रनाथ ठाकुर



[बंगला]

यदि तोर डाक शुने केउ ना आसे तॅबे एकला चलो रे।
तॅबे एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे।।
यदि केउ कॅथा ना कॅय, ओरे ओरे ओ अभागा,
यदि सबाइ थके मुख फिराये,
सबाई करे भय-तबे परान खुले,
ओ तुई मुख फुटे तोर मनेर कॅथा एकला बालो रे।।
यदि केउ कॅथा ना कॅय,
ओरे ओरे ओ अभागा,
यदि गहन पथे जावार काले केउ फिरे ना चाय- तबे पथेर काँटा,
ओ तुई रक्तमाखा चरणतले एकला दलो रे।।
यदि आलो ना धरे, ओरे ओरे ओ अभागा,
यदि झड़बादले आँधर राते दुआर देय घरे- तबे वज्रानले,
आपॅन बुकेर पाँजर ज्वालिये निये एकला ज्वलो रे।।




[हिन्दी में रूपान्तर]

तेरी आवाज पे यदि कोई न आये, तो फिर चल अकेला रे।
तो फिर चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला रे।।
यदि कोई भी न बोले, ओरे ओरे ओ अभागे,
यदि सभी मुख मोड़े रहें,
सब डरा करें, तब डरे बिना,
तेरे मन की बात, मुक्त-कण्ठ, कह अकेला रे।।
यदि लौट जायें सभी, ओरे ओरे ओ अभागे,
यदि गहन डगर चले, देखे मुड़ के न कोई तब राहों के कांटे,
ओ तू रक्त - रंगे, चरण - तले, दल अकेला रे।।
यदि दीप न धरें, ओरे ओरे ओ अभागे,
झड़ी - आँधी - भरी रात में, घर बन्द यदि करें तब वज्र -
शिखा से तू अपनी अस्थियाँ जला और जल अकेला रे।।



Translated In Hindi by : Dawlala Kothari